शनिवार, 7 मई 2011

हमार कुछ दोहा


डाढ़ी जर अब गाछ के, बाटे रहल बटोर।
आखिर फल कइसे मिली, पत्ता पत्ता चोर॥1

जर से ले के डाढ़ तक, केहू ना कमजोर।
केहू अधिका ले गइल, केहू थोरका थोर॥2

जब घरहिं के लोग कइल, आपन देस गुलाम।
जिअते जी जे मर गइल, ओकरा से का काम॥3

पानी मेहनत खेत सब, आपन कहे किसान।
नेताजी के पेट में, चहुँपल सारा धान॥4

सर-सर करते जब चलल, मुखिया जी के कार।
आपन टूटल साइकिल, बाह बाह सरकार॥5

सभका खातिर एक बा, भइया ई कानून।
साँझे छूटल, जे कइल भोरे दस गो खून॥6

काल्हे ले जे जोड़लस, आपन दूनो हाथ।
पाँच बरिस के बाद मिलि, अइसन कहवाँ साथ॥7

लूटल पहिले पाँच जे, लूटल आज पचास।
भइल कहां बा आजतक, अतना तेज बिकास॥8

नइखे आपन घर कहीं, ई कइसन भगवान।
तबहूं पूजे रात दिन, सारा हिन्दुस्तान॥9

कोई लउके जब कहीं, तनिओ मनी प्रसन्न।
पहुँचावल जे दुख उहे, बाटे मानुष धन्न॥10

लीटर के मीटर घटल, पूरा गड़बड़ खेल।
सस्ता ‘चंदन’ खून से, भइल किरासन तेल॥11




ई रचना अँजोरियो पर 20 फरवरी 2011 के प्रकाशित भइल बाS। 

1 टिप्पणी:

  1. bahut e badhiya doha baate...hamahu kabhi kuch kavita likhale rahi shayad pasan aave http://www.bhojpurigaane.com/2009/08/bhojpuri-kavita-bhojpuri-poem-i_8537.html



    http://www.bhojpurigaane.com/2009/10/bhojpuri-kavita-bhojpuri-poem-ii_504.html

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