शनिवार, 18 जून 2011

तू पूछबS कि हम के हईं (लघुकथा)

पान सौ साल पहिले के बात ह। दुआरी पर एगो राही आइल आ केंवारी बजवालस। घर में से हम निकलनी आ पूछनी कि का बात ह? राही कहलस कि तनिसा जगे चाहीं रहे खातिर। हम अपना खाली जमीन में से तनी सा दे देहनी। पूरा धरती आपने नू ह।
लेकिन कुछ दिन का बाद हम देखनी कि ओकर हाथ-गोर बढ़े लागल। अब ऊ धीरे-धीरे फइले लागल। एकदिन अइसन आइल कि हमरा घर में ऊ घुसे लागल। धीरे-धीरे हमरा घर के हथिया के हमरा के घर से बाहर निकाल देलस। हमरा घर में आज ऊ नइखे रहत काहे कि कुछ लोग अइसन रहे जे आपन जान दे के भी ओकरा के भगवलस लेकिन ओकरा गइला के बादो हम अपना घर से बाहर दुआरी पर कोने में बानी। जब हम अपना घर में घुसे के चाहेनी तब हमरे घर से कुछ आदमी निकलेलन आ कहेलन कि तहार ईंहा कवनो जगह नइखे। जा बहरी जा। ई सुनके हमार परान सुख गइल। हमरे घर के लइका आपन जान देके जवना खातिर चल गइलें स, ईहो ओही घर के लोग ह जे बहरी भगावता। अब त ई लोग ओही राही के गारी से जाके ले आवता। मिठाई खिआवता बाकिर हमरा घर में हम ना घुस सकीले।

तू पूछबS कि हम के हईं? अब का बताईं? हम हईं - भासा। ना बूझल? अरे हिन्दी नाँव ह हमार, हमार एगो नाँव भोजपुरी ह। हम कवनो अकेला थोरे बानी। हमरा अइसन बहुते लोग बा। बहुते बहिन बारी स।

1 टिप्पणी:

  1. रोचक, बढि़या बयान.
    याद आ रही है कहानी 'मुगलों ने सल्‍तनत बक्‍श दी'.

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