रविवार, 6 नवंबर 2011

कवनो बेटा / जिउतिया ना करे / माई खातिर


आपन लिखल कुछ हाइकु ईहाँ दे रहल बानी।

कह ल ठंढ़ा
चांद गरम होखे
जा रहल बा ।

कवि के झोरा      
कविता से भरल
सुनेवाला बा ?      

कवनो पशु
केहू के बेटा होला
आदमिए ना ?

रोगी मरता        
सुतल बा चैन से,   
डॉक्टर लोग । 

अब कहाँ बा ?
गाँव में मजदूर
खोजलो पर ।

सुतल रह 
चैन से साँप पर
विष्णु बन के ।

आ अन्त में एगो आउर हाइकु जवना के बारे में हमार सोंच बा कि ई बहुत बन्हिआ आ हमार सबसे ताकतवर भोजपुरी हाइकु हS-

कवनो बेटा        
जिउतिया ना करे
माई खातिर

अइसे ई कहल ठीक त नइखे कि हमार आपने लिखल एतना महत्व के बाS, बाकिर समाज में पुरुषवर्ग के तानाशाही आ दबदबा के आ स्त्रीवर्ग के धर्म से लेके सब छेत्र में, बान्हल बन्धन के एगो नीमन झलक जरूर ए हाइकु से मिली। 

जिउतिया माने जीवितपुत्रिका व्रत, जवना के मातारी लोग एसे करेला कि पुत्र (एमें सम्भवत: पुत्री के जिक्र नइखे) दीर्घायु होखे। भोजपुरी क्षेत्र में जिउतिया के एगो खास महत्व बा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेटा जिउतिया हरगिज न करे, हर्ज नहीं, बस जरूरत होने पर बुजुर्गों की सेवा-सम्‍मान करता रहे, पर्याप्‍त होगा.

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  2. यहाँ परम्परा की बात उठाने की कोशिश की थी कि व्रतों की कल्पना स्त्रियों
    के लिए ही क्यों, पुरुष के लिए स्त्री व्रत करे और स्त्री के लिए कुछ
    नहीं?…वैसे आपका कहना सही है। मुझे पैर छूकर प्रणाम करने की नकली परम्परा
    से अच्छा यही लगता है कि सम्मान करें और मन में आदर भाव हो…

    उत्तर देंहटाएं

ईहाँ रउआ आपन बात कह सकीले।